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आखिर क्यों भगवान कृष्ण ने किया था कर्ण का अंतिम संस्कार

मित्रों महारथी कर्ण के संबंध में तो आप लोगों को पता ही होगा। ये महाभारत के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से एक थे। स्वयं सूर्यपुत्र और क्षत्रिय कुल का होते हुए भी आजीवन सूतपुत्र कहलाते रहे। कर्ण ने महाभारत में अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभाने में कोई कमी नही छोड़ी है। आपको बता दें कि कर्ण के तुरिन में वाणों के ऐसे भंडार थे जो संसार में दुर्लभ माने जाते है, पर आज हम इस पोस्ट के माध्यम से यह बताने वाले है कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने महारथी दानवीर कर्ण का अंतिम संस्कार क्यों किया था। तो आइए जाने आखिर क्या था इसका कारण।  

आपको बता दें कि महाभारत में जिस समय कर्ण मृत्युशैया पर थे,  उस समय श्री कृष्ण जी उनके पास उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए पहुंचे। कर्ण ने श्रीकृष्णजी से कहा कि उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। इस पर श्रीकृष्ण ने उनसे उनका सोने का दांत मांग लिया। कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर श्री कृष्ण जी को दे दिया। श्रीकृष्ण ने कहा यह स्वर्ण तो जूठा है। इस पर कर्ण ने अपने धनुष से धरती पर बाण चलाया तो वहां से गंगा की तेज जलधारा निकल पड़ी उससे दांत धोकर कर्ण ने कहा अब तो ये शुद्ध हो गया। इसके पश्चात कृष्णजी ने कर्ण से कहा था कि ‘‘तुम्हारी यह बाण गंगा युग युगों तक तुम्हारा गुणगान करती रहेगी।‘‘ घायल कर्ण को श्रीकृष्णजी ने आशीर्वाद दिया था कि ”जब तक सूर्य, चन्द्र, तारे और पृथ्वी रहेंगे, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में किया जाता रहेगा। वहीं श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।  

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि कर्ण ने कृष्णजी से पहला वर यह मांगा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने के कारण उसके साथ बहुत छल हुए हैं। अगली बार जब कृष्णजी धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें, दूसरे वर के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्णजी उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां कोई पाप ना हुआ हो। उनकी इस इच्छा को सुनकर श्रीकृष्णजी दुविधा में पड़ गए थे क्योंकि पूरी पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं था, जहां एक भी पाप नहीं हुआ हो। ऐसी कोई जगह न होने के कारण श्रीकृष्ण ने कर्ण का अंतिम संस्कार अपने ही हाथों पर किया। इस तरह दानवीर कर्ण मृत्यु के पश्चात साक्षात वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए।

आपको बताते चलेंकि तापी नदी के किनारे कर्ण का शवदाह किए जाने के पश्चात् पांडवों ने जब कुंवारी भूमि होने पर शंका जताई तो श्रीकृष्णजी ने कर्ण को प्रकट करके उससे आकाशवाणी द्वारा कहलाया था कि अश्विनी और कुमार मेरे भाई हैं। तापी मेरी बहन हैं। मेरा कुंवारी भूमि पर ही अग्निदाह किया गया है। पांडवों ने कहा हमें तो पता चल गया परंतु आने वाले युगों को कैसे पता चलेगा? तब भगवान कृष्ण ने कहा कि यहां पर तीन पत्रों का वट वृ़क्ष होगा जो ब्रह्मा, विष्णु, और महेश का प्रतीक रूप होगा। कर्ण के जीवनवृत पर श्री शिवा जी सावंत द्वारा लिखी गई ‘मृत्युंजय’ नामक पुस्तक में भी इसका वर्णन मिलता है। इस जानकारी के संबंध में आप लोगों की क्या प्रतिक्रियायें है?

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